Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 4, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यत्र संकल्पनं तत्र तन्मनोऽङ्ग तथा स्थितम् ।
संकल्पमनसी भिन्ने न कदाचन केचन ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त बात को ही विषयभेदव्यवस्था के प्रदर्शन द्वारा दृढ़ करते हैं ।
हे श्रीरामजी, जिस विषय का संकल्प होता है, उसमें मन संकल्परूप से स्थित रहता
है, अर्थात् जो संकल्प है वही मन है संकल्प और मनका कदापि किसी से भेद नहीं किया
गया है