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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 62–64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 4, verses 62–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 62-64

संस्कृत श्लोक

यदस्ति तस्य नाशोऽस्ति न कदाचन राघव । तस्मात्तन्नष्टमप्यन्तर्बीजभूतं भवेद्धृदि ॥ ६२ ॥ स्मृतिबीजाच्चिदाकाशे पुनरुद्भूय दृश्यधीः । लोकशैलाम्बराकारं दोषं वितनुतेऽतनुम् ॥ ६३ ॥ इत्यनिर्मोक्षदोषः स्यान्न च तस्येह संभवः । यस्माद्देवर्षिमुनयो दृश्यन्ते मुक्तिभाजनम् ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

परिणामवाद मे दोष दिखलाते हैं । हे राघव, जिस वस्तुका अस्तित्व है, उसका कदापि नाश नहीं हो सकता, इसलिए नष्ट हुआ भी वह बीजरूप से हृदयमें विद्यमान रहता है । भाव यह है कि परिणामवादमें उत्तर अवस्थाओं में पूर्व पूर्व अवस्थाओं का तिरोभावमात्र होता है, उच्छेद नही होता, कारण कि सत्‌ का अभाव कभी नहीं हो सकता । ऐसी अवस्थामें नाशरूप षड्‌ विकार से तिरोहित द्वैत के चित्त में अथवा प्रकृति में स्थित रहने से काम, कर्म, वासनारूप बीजसे पुनः उद्भव को कोई रोक नहीं सकता, अतः अनिर्मोक्ष प्रसंग होगा । दुश्यवुद्धि स्मृतिरूपी बीज से चिदाकाशमें फिर उत्पन्न होकर भुवन, पर्वत, आकाश आदि आकारवाले महान्‌ दोषकी सृष्टि करती है । इस प्रकार अनिर्मोक्षिरूप दोष होगा, पर उसका यहाँ पर सम्भव नहीं हे, क्योंकि अनेक देवता, ऋषि, मुनि जीवन्मुक्त देखे जाते हैं