Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 4, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
यदि स्याज्जगदादीदं तस्मान्मोक्षो न कस्यचित् ।
बाह्यस्थमस्तु हृत्स्थं वा दृश्यं नाशाय केवलम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह चिदात्मा स्वभिन्न प्रधान में स्थित दृश्य को अविवेक से अपने हृदय में स्थित देखता
है, वही उसका यह संसार है । विवेकञ्ञान के उदय से पूर्वोक्ति अविवेकजनित अभिमान की
निवृत्ति होने पर बाह्य पदार्थो के रहनेपर भी मोक्ष हो जायेगा, इस प्रकार सख्य प्रक्रिया की
आशंका कर कहते है ।
यदि इस जगत् आदि का अस्तित्व रहेगा, तो उससे किसीका भी मोक्ष नहीं होगा, वह
(दृश्य) चाहे बाहर में स्थित हो, चाहे अन्तःकरणमें स्थित हो पर वह केवल स्वरूपनाश के
लिए ही होता है