Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
सर्पैकप्रत्ययो रज्ज्वामसर्पप्रत्यये बलात् ।
निवर्ततेऽन्यथा त्वेष तिष्ठत्येव यथास्थितः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानप्रयत्न से अन्यथाभाव का उदाहरण देते हैं।
यह “रज्जू है, यों प्रयत्नपूर्वक रज्जुपदार्थ का निश्चय होने पर रज्जू में सर्पज्ञान निवृत्त
हो जाता है, अन्यथा (प्रयत्न न होने पर) वह ज्यों-का-त्यों बना रहता है