Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यथा संवित्तथा चित्तं यथा चित्तं तथेहितम् ।
बालं प्रत्यपि संसिद्धमेतत्को नानुभूतवान् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चित्त सवित्-शवक्ति का अनुसरण करती है, वैसे ही चेष्टा भी चित्त का अनुसरण
करती है, यह भी प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं।
जैसी संवित् होती है, वैसा ही चित्त होता है और जैसा चित्त रहता है वैसी चेष्टाएँ भी होती
हैं, यह बालक तक को सुविदित है, फिर दूसरे को यह क्यों न सुविदित होगा ?