Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 36–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verses 36–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 36,37
संस्कृत श्लोक
अस्मदादिः प्रबुद्धात्मा किलावश्यं विमुच्यते ।
कथं भवन्तु नो मुक्ता विदेहाः पद्मजातयः ॥ ३६ ॥
अन्ये त्वमिव ये जीवास्तेषां मरणजन्मसु ।
स्मृतिः कारणतामेति मोक्षाभाववशादिह ॥ ३७ ॥
भवत्यद्रिर्धराधारो बद्धपीठो नभः शिराः ।
जीवो हि मृतिमूर्च्छान्ते यदन्तः प्रोन्मिषन्निव ।
अनुन्मिषित एवास्ते तत्प्रधानमुदाहृतम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी हम
लोग भी अवश्य मुक्त हो जाते हैं फिर ब्रह्मा आदि क्यों न विदेहमुक्त होंगे ? श्रीरामजी,
इस लोक में आपके सदुश जो अन्य जीव हैं, उनकी मृत्यु और उत्पत्ति के हेतुभूत सृष्टि
में पूर्वजन्म के मिथ्या पदार्थों के वासनानुभव से जन्य ही स्मृति कारण होती है, क्योंकि
उनका मोक्ष नहीं होता