Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
तद्व्योमप्रकृतिः प्रोक्ता तदव्यक्तं जडाजडम् ।
संस्मृतेरस्मृतेश्चैव क्रम एष भवोदये ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि श्रीरामचन्द्रजी को यह शंका हो कि हिरण्यगर्भ की सृष्टि प्रकृति से महत्, अहंकार
आदि क्रम से होती है, ऐसा पुराण आदि में चुना जाता है । जीव की सृष्टि की समता कैसे हो
सकती है, तो उसमें भी प्रकृति, महत् आदि के भ्रम का उपपादन करते है ।
मृत्युरूपी मूर्च्छा के अव्यवहित उत्तर क्षण में अन्दर तनिक तनिक उन्मेष होता हुआ
(स्फुरित होता हुआ) भी बाहर जो जीव उन्मेषरहित ही रहता हे, पुराण आदि शास्त्रों में
उसकी वह अवस्था प्रधान” यानी मूलप्रकृति कही गई हे ॥३ ८॥
“आकाश एव तदोतं च प्रोतं च“ (आकाश में ही वह ओत ओर प्रोत है) इत्याति श्रुति से
आकाशादि शब्द भी उसमें प्रसिद्ध हैं, ऐसा कहते है ।
पूर्वोक्त मूलप्रकृति आकाश प्रकृति नाम से भी शास्त्रों में कही गई है, यह अव्यक्त यानी
मूल प्रकृति जड भी है ओर अजड भी है । चित् का प्रतिबिम्ब पड़ने ओर न पड़ने से जड़ाजड़
है अर्थात् स्वभावतः जड़ है और चित्प्रतिविम्ब पडने से अजड (चेतन) है । वह विश्वबीज
मूलप्रकृति ही संस्मृति ओर अस्मृति की यानी सृष्टि और संहार की भी मूल कारण है ओर वही
भव के उदय और अन्त की अवधि है