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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 47–50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verses 47–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 47-50

संस्कृत श्लोक

सुरपत्तनशैलार्कतारानिकरसुन्दरम् । जरामरणवैक्लव्यव्याधिसंकटकोटरम् ॥ ४७ ॥ स्वभावाभावसंरम्भस्थूलसूक्ष्मचराचरम् । साव्ध्यद्व्युर्वीनदीशाहोरात्रिकल्पक्षणक्षयम् ॥ ४८ ॥ अहं जातोऽमुना पित्रा किलात्रेत्याप्तनिश्चयम् । इयं माता धनमिदं ममेत्युदितवासनम् ॥ ४९ ॥ सुकृतं दुष्कृतं चेदं ममेति कृतकल्पनम् । बालोऽभूवमहं त्वद्य युवेति विलसद्धृदि ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त जगद्भ्रम का ही विस्तार से प्रतिपादन करतेहै। उस जगद्भ्रम का अनुभव करता है, जो इन्द्र आदि देवताओं, अमरावती आदि श्रेष्ठ नगरों, मेरु आदि उनके पर्वतो, सूर्य, चन्द्र ओर सितारों से बड़ा मनोहर है, जरा (बुढापा), मरण, दुश्चिन्तार्पँ, शारीरिक क्लेश आदि से परिपूर्ण मर्त्यलोकरूप खोखले से युक्त है, इसमें अपनी इष्ट वस्तु के संपादन में ओर अनिष्ट वस्तु के निवारण में स्थूल सूक्ष्म चर-अचर सभी प्राणी उद्योगशील हैं, दिन, रात, कल्प, क्षण ओर प्रलय समुद्र, पर्वत, नदियों और उनके अधिपतियों (अधिष्ठाता देवों) से युक्त हैं जिस जगद्भ्रम में मैं इस स्थान में इस पिता से उत्पन्न हुआ हूँ, ऐसा निश्यच रहता है, यह मेरी माता है, यह मेरी धन-सम्पत्ति है, ऐसी दृढ़ वासना जागरूक रहती है, यह मेरा पुण्य है, यह पाप है, ऐसी कल्पना बद्धमूल रहती है, मैं पहले बच्चा था, किन्तु आज युवक हूँ, ऐसी प्रतीति रहती है, यों हृदय में विलास को प्राप्त हो रहे जगद्भ्रम को देखता हे