Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
व्योमैवानुभवत्यच्छमहं जगदिति भ्रमम् ।
व्योमरूपं व्योमरूपी जीवो जात इवात्मवान् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
आगन्तुक देह आदि रूप से आत्मवान् हुआ सा व्योमरूपी
जीव आगन्तुक देह आदि को आत्मा समझकर निर्मल चिदाकाश मेँ ही "यह मैं हूँ, "यह जगत्
है" इस व्योमरूपी भ्रम का अनुभव करता है