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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 54–55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verses 54–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 54,55

संस्कृत श्लोक

यत्रैष म्रियते जीवस्तत्रैवं पश्यति क्षणात् । प्रत्येकमुदितेष्वेवं जगत्खण्डेषु भूरिशः ॥ ५४ ॥ कोटयो ब्रह्मरुद्रेन्द्रमरुद्विष्णुविवस्वताम् । गिर्यब्धिमण्डलद्वीपलोकान्तरदृशां गताः ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ पर यह जीव मरता हे, वहीं पर इस प्रकार से वर्णित वनखण्ड को एक क्षण में देखने लगता ह । इस प्रकार प्रत्येक जीव में उदित हुए जगद्रूप वनखण्डों में पर्वतश्रेणियों, समुद्रसमुदायो, द्वीपो ओर लोकों को ब्रह्म के अन्दर देखनेवाले अनेक करोड ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, देवता, विष्णु और सूर्य चले गये हैं यानी नष्ट हो गये है