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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

एवं कुड्यमयं विश्वं नास्त्येव मननादृते । मनने चलमेवान्तस्तदिदानीं विचारय ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार प्रपंच के आरोपक्रम का वर्णन कर अब क्रमश: अपवाद का वर्णन करते हैं। इस प्रकार कुड्यमय (दीवार के तुल्य स्थूल) जगत्‌ मन के संकल्परूप मनन से अतिरिक्त है ही नहीं, क्योकि श्रीणि रूपीणीत्येव सत्यम्‌ ऐसी श्रुति है। ( & ) शंका - स्थूल पदार्थ स्थिर स्वभाववाले होते हैं और मन तो चंचल है, ऐसी अवस्था में विश्व की मनोमात्रता कैसे ? समाधान - यद्यपि बाहर विश्व स्थिर प्रतीत होता है तथापि मनन करने में मन से 4 छन्दोग्योपनिषद्‌ ६-४-१ में कहा है - त्रिवृतूकृत अग्नि का जो लाल रूप लोक में प्रसिद्ध है उसे अत्रिवृत्कृत तेज का रूप जानो, जो, अग्नि का शुक्लरूप है, उसे त्रिवृत्‌ न किये गये जल का रूप जानो और जो अग्नि का काला रूप है, उसे अत्रिवृत्कृत पृथ्वी का रूप जानो । ऐसी अवस्था में जिसे तुम तीन रूपों से अतिरिक्त “अग्नि'समझते थे, उस अग्नि का अग्नित्व गया यानी उक्त तीन रूपों का विवेक होने से पहले जो तुम्हारी अग्निबुद्धि थी वह अग्निबुद्धि गई ओर अग्निशब्द भी गया क्योंकि वह नाममात्र है, तीन रूप ही सच हैं । जैसे उक्त स्थल में तीन रूप से पृथ्वी अग्नि नहीं है, वे तीन रूप ही सत्य है, स्थूल अग्नि सत्य नहीं है, वेसे ही प्रकृत में मन से अतिरिक्त स्थूल विश्व नहीं है। अपनी इच्छानुसार जाना जाता हुआ भीतर अस्थिरस्वभाव ही प्रतीत होता है, मनसे मलिन होने पर मलिन सा ओर मनोरथ आदिमं उत्पन्न कर दूसरी जगह रक्खा जाता हुआ सा सभी लोगों द्वारा अनुभूत होता है, उसी का इस समय आप अपने अनुभव से विचार कीजिए