Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 45–50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 41, verses 45–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 45-50
संस्कृत श्लोक
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् ।
इतीयमातता भ्रान्तिर्भवतो भूरिसंभ्रमा ॥ ४५ ॥
नानाचारविहाराढ्या सलोकान्तरसंचरा ।
यस्मिन्नेव मुहूर्ते त्वं मृतिमभ्यागतः पुरा ॥ ४६ ॥
तदैव प्रतिभैषा ते स्वयमेवोदिता हृदि ।
एकामावर्तचलनां त्यक्त्वा दत्ते यथाऽपराम् ॥ ४७ ॥
क्षिप्रमेव नदीवाहो वित्प्रवाहस्तथैव च ।
आवर्तान्तरसंमिश्रो यथावर्तः प्रवर्तते ॥ ४८ ॥
कदाचिदेवं सर्गश्रीर्मिश्राऽमिश्रा च वर्धते ।
तस्मिन्मृतिमुहूर्ते ते प्रतिभानमुपागतम् ॥ ४९ ॥
एतज्जालमसद्रूपं चिद्भानोः समुपस्थितम् ।
यथा स्वप्नमुहूर्तेऽन्तः संवत्सरशतभ्रमः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं सम्पूर्ण दुःखों के उपरत होने से
शान्त होऊँगा, निरतिशय सुख की समृद्धि होने से मुक्त होऊँगा, केवल एकरस सुख ही
होकर मैं स्थित होऊँगा, इस प्रकार की प्रचुर शाखा-प्रशाखाओं से युक्त भ्रान्ति, जो कि
नाना प्रकार के आचार विहारो ओर लोकान्तर में गमन से युक्त हे, फैली हे । पहले जिस मुहूर्त
में तुम मृत्यु को प्राप्त हुए, उसी समय यह प्रतिभा अपने-आप तुम्हारे हृदय मेँ उदित हुई । जैसे
नदी का प्रवाह एक आवर्त का त्यागकर शीघ्र ही दूसरे आवर्त का ग्रहण करता है यानी बनाता
हे, वैसे ही चित्तप्रवाह भी एक सृष्टिका त्यागकर दूसरी सृष्टि का ग्रहण करता है । जैसे आवर्तं
भी अन्य आवर्त से मिला हुआ और कभी विना मिला हुआ प्रवृत्त होता है वैसे ही यह सृष्टि भी
जाग्रत में अन्य जीवों की सृष्टि से युक्त और स्वप्न में अमिश्र यानी अन्य जीवों की सृष्टि से
रहित है, उस मरण मुहूर्तमें चिद्रूप सूर्य जो तुम हो तुम्हारी प्रतिभा को प्राप्त हुआ असद्रूप यह
जगज्जाल उपस्थित हुआ हे । जैसे स्वप्न के एक मुहूर्त के अन्दर सैकड़ों वर्षो की भ्रान्ति होती
हे