Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 51–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 41, verses 51–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 51-53
संस्कृत श्लोक
यथा संकल्पनिर्माणे जीवनं मरणं पुनः ।
यथा गन्धर्वनगरे कुड्यमण्डनवेदनम् ॥ ५१ ॥
यथा नौयानसंरम्भे वृक्षपर्वतवेपनम् ।
यथा स्वधातुसंक्षोभे पूर्वपर्वतनर्तनम् ॥ ५२ ॥
यथा समञ्जसं स्वप्ने स्वशिरःप्रविकर्तनम् ।
मिथ्यैवैवमियं प्रौढा भ्रान्तिराततरूपिणी ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मनोरथ में जीवन ओर मरण होते हैं, जैसे गन्धर्वनगर मे भीत ओर भीत
को शोभित करनेवाले चित्रों की प्रतीति होता है, जैसे नौका के वेग से चलने पर वृक्ष ओर
पर्वतो का कम्पन (चलन) प्रतीत होता है, जैसे अपने वात, पित्त आदि धातुओं का सन्निपात
होने पर पर्वतों का चलना प्रतीत होता है और जैसे स्वप्न में अपने शिर का काटना दिखाई देता
है, जो पूर्व में कभी अनुभूत नहीं है और जो अव्यवहार्य है, वैसे ही विस्तृत रूपवाली अतएव
दुरुच्छेद्य यह प्रपंच भ्रान्ति भी मिथ्या ही है