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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 57–63

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 41, verses 57–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 57-61

संस्कृत श्लोक

न चेमे गिरयो ग्रामा न चैते न च वै वयम् । गिरिग्रामकविप्रस्य मण्डपाकाशके किल ॥ ५७ ॥ तल्लीलाभर्तृदाराढ्यं जगदाभाति भास्वरम् । तत्र लीलाराजधानी मण्डपामण्डिताकृतिः ॥ ५८ ॥ भाति तस्योदरे व्योम्नि तदेवं विदितं जगत् । तस्मिञ्जगति गेहेऽन्तर्यस्मिन्वयमिह स्थिताः ॥ ५९ ॥ एवं तेषां मण्डपानां व्योमाव्योमैव निर्मलम् । तथैव मण्डपेष्वस्ति न मही न च पत्तनम् ॥ ६० ॥ न वनानि न शैलौघा न मेघसरिदर्णवाः । केवलं तत्र निःशून्ये विहरन्ति गृहे जनाः ॥ ६१ ॥ न पश्यन्ति जना नापि पार्थिवा न च भूधराः । विदूरथ उवाच । एवं चेत्तत्कथं देवि ममेहानुचरा इमे ॥ ६२ ॥ संपन्ना आत्मना सन्ति ते किमात्मनि नोऽथवा । जगत्स्वप्नार्थवद्भाति तस्य स्वप्ननरादयः ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

अल्पतर मे महत्तर वस्तुका न समा सकना ही प्रपंच के मिथ्यात्व का कारण है, इस आशय से कहते हैं। गिरिग्राम के ब्राह्मण के मण्डपाकाश में सभार्य लीलापति से युक्त यह भास्वर (दैदीप्यमान) जगत्‌ प्रतीत होता है । उसमें बहुत से भवनों से सुशोभित लीला की राजधानी है । उक्त ब्राह्मण के गृहाकाशमें इस प्रकार से जाना गया यह जगत्‌ है । जिस घर में इस समय हम लोग बैठे हैं, वह उस जगत्‌ में प्रतीत होता है । इस प्रकार मण्डपों का जो आकाश है, वह आकाश आदि से शून्य निर्मल (ब्रह्म) ही है । उसी प्रकार मण्डपों में न पृथिवी है और न नगर ही है, न वन है, न पर्वतश्रेणियाँ हैं, न मेघ, नदियाँ और सागर ही हैं । केवल चिन्मात्रपूर्ण उस ब्रह्मरूप मिथ्या घर में मिथ्या पुरुष विहार करते हैँ । न लोग देखते हैं, न राजा हैं और न पर्वत हैं