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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 64–69

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 41, verses 64–69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 64-69

संस्कृत श्लोक

कथमात्मनि सत्याः स्युर्न सत्या वेति मे वद । श्रीसरस्वत्युवाच । राजन्विदितवेद्येषु शुद्धबोधैकरूपिषु ॥ ६४ ॥ न किंचिदेतत्सद्रूपं चिद्व्योमात्मसु जागतम् । शुद्धबोधात्मनो भाति कृतो नाम जगद्भ्रमः ॥ ६५ ॥ रज्ज्वां सर्पभ्रमे शान्ते पुनः सर्पभ्रमः कुतः । असद्भावे परिज्ञाते कुतः सत्ता जगद्भ्रमे ॥ ६६ ॥ परिज्ञाते मृगजले पुनर्जलमतिः कुतः । स्वप्नकाले परिज्ञाते स्वे स्वप्नमरणं कुतः । स्वस्वप्ने स्वप्नमृतिभीरमृतस्यैव जायते ॥ ६७ ॥ बुद्धस्य शुद्धस्य शरन्नभःश्रीः स्वच्छावदातातितताशयस्य । अहं जगच्चेति कुशब्दकार्थो न वस्तुतः सोऽङ्ग हि वाचिकं तत् ॥ ६८ ॥ इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायंतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम । स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो शुद्ध बोधस्वरूप हैं, ऐसे चिदाकाशरूपी पुरुषों की दृष्टि से यह जगत्‌ समबन्धी कुछ भी पदार्थ सत्‌ नहीं हे । जो शुद्ध बोधस्वरूप है, उसे जगद्भ्रम कहाँ से हो सकता है ? रस्सी में सर्प भ्रम के निवृत्त हो जाने पर फिर सर्पभ्रम कहाँ से होगा ? जगद्‌भ्रम असत्य है, यह जब भलीभाँति ज्ञात हो गया, फिर उसकी सत्ता कैसे ? मरूभूमि में प्रतीत होनेवाले मृगजल के स्वरूप का परिज्ञान होने पर फिर उसमें जलबुद्धि कैसे हो सकती है ? स्वप्नकाल में, जाग्रत से अपने स्वरूप के परिज्ञात होने पर अपना मरण कैसे सत्य हो सकता है ? अपनी स्वप्नावस्था में अमृत पुरुष को ही अपने मरण का भय होता है । मेघरूप आवरण का विनाश होने पर जैसे शरत्कालीन आकाशकी शोभा स्वच्छ हो जाती है, वैसे ही आत्मज्ञान से अज्ञानरूप आवरण का विनाश होने पर जिसका हृदय स्वच्छ ओर स्फुरित होती हुई आत्मप्रभासे धवल और आत्मेक्यापत्ति से पूर्णता रूप विस्तार को प्राप्त हुआ है, ऐसे शुद्ध ओर तत्त्ववेत्ता पुरुष की बुद्धि में अज्ञानियों की दृष्टि मेँ होनेवाली 'मैं" और “जगत्‌ ऐसी प्रतीति वस्तुतः नहीं है, वह केवल वाचिक व्यवहारमात्र है । महर्षि वाल्मीकिजी के इतनी कथा कह चुकने पर दिन बीत गया, सूर्य भगवान्‌ अस्ताचल-शिखर की ओर अग्रसर हो गये ओर भरद्वाज आदि मुनियोँ की सभा वाल्मीकिजी को प्रणाम कर सायंकाल के सन्ध्यावन्दन आदि कृत्य के लिए स्नानार्थ चली गई एवं २त्रि बीतने पर सूर्य के उगते उगते मुनिमण्डली सभा स्थान में आ गई