Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
वेदितृत्वैक्यवशतो नरतेवावबुध्यते ।
आत्मन्यतश्चिद्बलेन द्वयोरप्येति सत्यता ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न और जाग्रत दोनों अवस्थाओं में भी आत्मा में नरता आदि के अवबोध में और
अध्यस्त सत्यतावबोध में अन्योन्यतादात्म्यसंसगध्यास ही हेतु है, ऐसा कहते हैं।
सत्य स्वप्रकाश अपरोक्ष चैतन्य के तादात्म्य से जनित संसगध्यास से नरता सी ज्ञात
होती हे, अतः चित् के बल से स्वप्न ओर जाग्रत में अध्यस्त तत्-तत् धर्मो की आत्मा में
सत्यता प्रसिद्ध होती है