Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
स्वप्नेऽपि स्वप्नपुरुषा न सत्याः स्युर्मुने यदि ।
वद तत्को भवेद्दोषो मायामात्रशरीरिणि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार स्वप्न और जाग्रत् के दश्यपदार्था परस्पर मिलित माया ओर उसके
अधिष्ठानात्मक सत्य ओर अनृत हैं, ऐसा कहा गया, ऐसी अवस्था में स्वप्नपदार्थ केवल
अनृतमात्र हों, उनमें सत्यांश के प्रवेश से क्या लाभ है ? ऐसी श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, यदि जाग्रत-पुरुष अधिष्ठान की सत्ता से सत्य न हों तो
व्यवहार में विसंवाद और कर्मकाण्ड का अप्रामाण्य आदि दोष होंगे, इसलिए वे सत्य हों, परन्तु
केवल मायास्वरूप स्वप्न मेँ कल्पित स्वप्न पुरुष उस प्रकारके सत्य न हों, तो क्या दोष है ?
तात्पर्य यह है कि भगवान् व्यासने “मायामात्रं तु कार्त्स्व्येनाइनभि-व्यक्तस्वरूपत्वात्” (स्वप्न
केवल मायास्वरूप ही है, क्योकि उसकी साकल्येन अभिव्यक्ति नहीं होती) इस सूत्र से स्वप्न
को केवल मायामात्र कहा है, ऐसी अवस्था में जाग्रत् जगत् की स्वप्नतुल्यता कैसे ?