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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवमेतत्तथैवास्ते सत्यत्वात्स्वप्रपत्तनम् । स्वप्नद्रष्टरि निर्निद्रेऽप्याकाशविशदाकृति ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जैसा आप कहते हैं, वह ठीक है, सत्यरूप होने से स्वप्नपत्तन स्वप्नद्रष्टा के जागने पर भी वैसा ही रहता है, क्योकि वह अधिष्ठान सन्मात्ररवभाव यानी सत्य ही है