Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
एतदास्तामिदं तावद्यज्जाग्रदिव मन्यसे ।
विद्धि तत्स्वप्नमेवान्तर्देशकालाद्यपूरकम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अगर ऐसा है, तो जाग्रत-पदार्थ की नाई स्वप्नपदार्थों का भी अन्य स्वप्नो में व्यवहार
संवाद होगा, ऐसी श्रीरामचन्द्रजी की जिज्ञासा को चिवो से ताडकर देशान्तर और कालान्तर
की अनुवृत्ति से अनेक जाग्रत्-पदार्थो में भी असंवाद है ही, पृथ्वी, आकाश, नाम, जाति
आदि कतिपय पदार्थों की अनुवृत्ति का संवाद स्वप्न में भी है ही, इसलिए जाग्रत और स्वप्न में
कोई भी अन्तर सिद्ध नहीं किया जा सकता, इस आशय से श्रीवस्रिष्ठजी कहते हैं अथवा
स्वप्न के पदार्थ यदि सत्य हों, तो जाग्रत में भी उनकी अनुवृत्ति होनी चाहिए । - श्रीरामचन्द्रजी
की ऐसी शंका को ताडकर श्रीवसिष्ठजी कहते हैं ।
आपकी शंका रहे, यदि आप स्वप्न के पदार्थों की जाग्रत्काल के बाहरी देश और काल में
अनुवृत्ति नहीं होती, इसलिए उन्हें असत्य समझते हैं, तो जिसे आप जाग्रत् मानते हैं, उसकी
भी तो आभ्यन्तर स्वप्न देश और काल में अनुवृत्ति नहीं होती यानी वह भी स्वाप्निक देशकाल
का पूरक नहीं होता, ऐसी अवस्था में दोनों की स्वप्नतुल्यता समान ही है