Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 20–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verses 20–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 20-27
संस्कृत श्लोक
हतसैन्यपुरापातं द्रुताङ्गाराभ्रकोटरैः ।
कर्कशाक्रन्दनिर्दग्धलोकपूगोग्रगर्जितम् ॥ २० ॥
कृशानुकणनाराचनिरन्तरतराम्बरम् ।
बहुहेतिशिलाजाललुठद्दग्धपुरोत्करम् ॥ २१ ॥
रणद्द्विरदसंघट्टकुट्टितोद्भटसद्भटम् ।
विद्रवत्तस्करच्छेदमार्गकीर्णमहाधनम् ॥ २२ ॥
अङ्गारराशिनिपतन्नरनार्युग्ररोदनम् ।
स्फुटच्चटचटाशब्दप्रलुठत्स्फुटकाष्ठकम् ॥ २३ ॥
विपुलालातचक्रौघशतसूर्यनभस्तलम् ।
अङ्गारशिखिराकीर्णसमस्तवसुधातलम् ॥ २४ ॥
दग्धाग्निकाष्ठक्रेकाररणज्जवलनवैणवम् ।
दग्धजन्तुघनाक्रन्दरुदत्सकलसैनिकम् ॥ २५ ॥
पांसुशेषात्तराजश्रीवृद्धतृप्तहुताशनम् ।
सकलग्रसनारम्भसोद्योगाग्निमहाशनम् ॥ २६ ॥
यदृच्छात्कारडात्कारकठिनाग्निरटद्गृहम् ।
अनन्तजन्तुभोज्यान्नवह्निभुक्तेन्धनस्पृहम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उस नगर मेँ मरे हुए सैनिकों
में से बचे हुए कुछ सैनिकों का नगर प्रवेश हो रहा था, जिनमें अगारे फैले हुए थे ऐसे
मेघच्छिद्रों से वह नगर उपलक्षित था, जिन्होंने बडे हृदयविदारक रोदन के साथ जनसमूहों
को जला डाला था, ऐसे शत्रुओं द्वारा उस नगरमें जोर जोर से गर्जना की जा रहा थी, वह
आग की चिनगारियों और अर्धचन्द्राकार बाणों से अत्यन्त निरवकाश था, वहाँ बहुत से
शस्त्रो ओर शिलाओं से अधजले पुरवासियों के झुण्ड गिर रहे थे, रणभूमिमें हाथियों की
टक्कर से शूरवीर योद्धा चूरचूर हो गये थे, नगर के मार्ग, भाग रहे चोरों का सिर काटने से
उनके द्वारा रखे गये धन से आकीर्ण थे, वहाँ अंगारों के समूहों से गिर रहे नर-नारियों का
हृदयविदारक रोदन हो रहे था, जले हुए काठ के टुकड़े चट चट शब्द के साथ इधर-उधर
गिर रहे थे, बड़े-बड़े अलात यानी जले हुए काष्ठं के चक्राकार समूहोंसे आकाशतल ऐसा
मालूम पड़ता था, मानों उसमें सौ सूर्य उगे हों, अँगारों की आग से सम्पूर्ण पृथिवीतल
व्याप्त था, जले हुए अग्निकाष्ठों (अगर) के साथ बाँस के बड़े-बड़े डंडे केंकार शब्द कर
रहे थे, जले हुए जीवों के करुणक्रन्दन से सब सैनिकों का हृदय दहल रहा था, वहाँ पर
राज्यश्री का ऐसा दाह होने पर, जब कि केवल धूलि ही शेष रह गई थी, अग्नि प्रबल और
तुप्त हुई, सर्वभक्षी अग्नि पूर्वोक्त प्रकार से सम्पूर्ण नगर को ग्रास करने में बड़ी उद्योगशील
थी वहाँ पर अकस्मात् ही दैवयोग से प्राप्त सर्वस्वहरण और दस्युओं द्वारा कुण्ठन से और
कठिनतम (क्रूरतम) अग्नि से घर रोदन कर रहे थे, असंख्य लोगों के भोजन के लिए
पर्याप्त अन्न के अग्नि द्वारा भस्म हो जाने पर वहाँ पर किसी की अवशिष्ट इन्धनमात्र में
स्पृहा हो रही थी