Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 17–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verses 17–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 17-19
संस्कृत श्लोक
मुष्टिग्राह्यमहामेघगर्जासंतर्जितोर्जितैः ।
घोरं कलकलारावैर्मांसलैर्दस्युजल्पितैः ॥ १७ ॥
पुष्करावर्तसंकाशधूम्रूभ्रपिहिताम्बरम् ।
प्रोड्डीनहेमाग्रनिभैर्ज्वालापुञ्जैर्निरन्तरम् ॥ १८ ॥
तरदुल्मुकखण्डोग्रतारातरलिताम्बरम् ।
अन्योन्यदेशसद्मौघप्रज्वलज्ज्वलनाचलम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त नगर लूटने के समय दूसरों को डराने के लिए महामेघो की गर्जना
के सदृश अपनी डाँटफटकार से बढे-चढे कोलाहल से पूर्ण डाकुओं के शोरगुल से भयानक
था । पुष्करावर्त मेघो के सदुश विशाल ओर भयावह धुएँ के बादलों से उसका आकाश
आच्छन्न था । आकाश में उड़ रहे ओर स्वर्ण के सदुश अग्रकान्ति वाले ज्वालापुंजों से वह
ठसाठस भरा था यानी तिल रखने को भी ऐसी जगह नहीं थी, जहाँ ज्वाला न हो, इधर
से उधर छनक रहे आधे जले हुए काष्ठरूपी उग्र यानी उत्पातसूचक तारों से उसका
आकाशचंचल था, वहाँ पर ज्वालाओं के परिवर्तन से हुए अन्योन्य देश के विनिमय से गृहों
के समूहरूपी बड़े-बड़े अग्नि के पर्वत जल रहे थे