Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 15–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verses 15–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
प्रलयानलसंक्षुब्धपूर्णैकार्णवरंहसा ।
पूर्णं परबलेनोग्रहेतिमेघतरङ्गिणा ॥ १५ ॥
कल्पान्तवह्निविगलन्मेरुभूधरभासुरैः ।
दह्यमानं महाज्वालाज्वालैरम्बरपूरकैः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
वह नगर प्रलयकाल में अत्यन्त विक्षुब्ध पूर्ण समुद्र के सदश वेगवाले भीषण हथियाररूपी
मेघतरंगों से पूर्ण शत्रु के दलबल से भरा था प्रलयकालीन अग्नि से जल रहे मेरूपर्वत के
सदश खूब चमकदार ओर आकाश को छूनेवाली बड़ी बड़ी ज्वालाओं की शिखाओं से जल
रहा था