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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verse 48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

दह्यमानो विनिर्याति न कलत्रं विना नरः । अहो बत दुरुच्छेदाः प्राणिनां स्नेहवागुराः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वयं जल रहा भी पुरुष अपने स्त्री-पुत्र आदिके बिना घर से नहीं निकलता । ओहो बड़ा खेद है कि प्राणियों का स्नेह बंधन कटना कठिन है