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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 46–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 46,47

संस्कृत श्लोक

स्त्रीणां ज्वालालवाः पश्य लिहन्त्यलकवल्लरीः । कुर्वन्तोऽशोकपुष्पाभां करभा इव पन्नगीः ॥ ४६ ॥ हा हा हरिणशावाक्ष्याः पक्षलक्षणपक्ष्मसु । कुमार्गेष्विव विश्रान्तिमेति कार्शानवी शिखा ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

देखो, अशोक के फूलों की कान्ति को धारण कर रही ज्वाला ओं की लपटें स्त्रियोंक अलकों को ऐसे चाट रही है, जैसे ऊंट लटकी हुई पेड़ों की शाखाओं को या दैवात्‌ उसमें लटकी हुई सर्पिणियों को चाटता है । हा हा , खेद है, अग्नि की शिखा मृगछौने के नेत्रो के तुल्य नेत्रवाली नायिकाकी भ्रमरों के परोंके सदुश काली नेत्रराजियों पर जैसे कोई कुमार्गो में विश्राम ले वैसे विश्राम लेती है