Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
नगरे नगसंकाशे लग्नोऽग्निर्व्याप्तदिक्तटः ।
दहंश्चटचटास्फोटैः पातयत्युत्तमां पुरीम् ॥ ८ ॥
कल्पाम्बुदघटातुल्या व्योम्नि धूममहाद्रयः ।
बलात्प्रोड्डयनं कर्तुं प्रवृत्ता गरुडा इव ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वताकार नगर में आग लगी है उसने अपनी ज्वालाओं से चारों दिशाओं
को व्याप्त कर रक्खा है । वह चट चट शब्दों से उत्तम नगरी को जलाती हुई तहस नहस
कर रही है । आकाश में प्रलयकाल की मेघ घटा के सदुश धुएँ के महान् पर्वत छाये हुए हैं,
मालूम होता है कि वे अपनी पूरी ताकत से उड़ने के लिए तैयार हुए गरूड़ हैं