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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 10–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verses 10–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 10-13

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । ससंभ्रमं वदत्येवं पुरुषे परुषारवः । उदभूत्पूरयन्नाशा बहिः कोलाहलो महान् ॥ १० ॥ बलादाकर्णकृष्टानां धनुषां शरवर्षिणाम् । बृंहतामतिमत्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम् ॥ ११ ॥ पुरे चटचटास्फोटैर्दहतां जातवेदसाम् । पौराणां दग्धदाराणां महाहलहलारवैः ॥ १२ ॥ तरतामग्निखण्डानां टांकारः कथितो रवैः । ज्वलितानां परिस्पन्दाद्धगद्धगिति चार्चिषाम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वह पुरुष राजा से यह सब कह ही रहा था कि बाहर दारुण चीत्कारों से परिपूर्ण बड़ा भारी कोलाहल पूरी ताकत के साथ कानों तक खीचें गये बाणों की वृष्टि करनेवाले धनुषों का था, चिंघाड़ रहे अत्यन्त मदोन्मत्त ओर बलवान्‌ हाथियों का था, नगर में चट चट शब्दों के साथ खूब जल रही आग की ज्वालाओं का था, जिनकी स्त्रियाँ और बालबच्चे जल गये थे ऐसे पुरवासियों के महान्‌ हाहाकार, स्पन्दमान अग्निज्वालाओं की प्रज्वलित शिखाओं के धग्‌-धग्‌ शब्द, इधर उधर तैर रहे अंगारों के शब्दों के साथ लोगों द्वारा उच्चारित टंकार उत्पन्न हुआ