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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 1–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 44, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतस्मिन्नन्तरे राजमहिषी मत्तयौवना । तद्विवेश गृहं लक्ष्मीरिव पङ्कजकोटरम् ॥ १ ॥ आलोलमाल्यवसना भिन्नहारलताकुला । अनुयाता वयस्याभिर्दासीभिर्भयविह्वला ॥ २ ॥ चन्द्राननावदाताङ्गी श्वासोत्कम्पिपयोधरा । तारकाकारदशना स्थिता द्यौरिव रूपिणी ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इसी बीच में राजरानी, जिसके शरीर के रोमरोमसे यौवन छलक रहा था, जैसे लक्ष्मी कमल के कोटर में प्रवेश करती हैं, वैसे ही राजा के घर में प्रविष्ट हुई, जिसमें लीला ओर सरस्वती देवी स्थित थी । राजरानी की मालाएँ ओर वस्त्र चंचल थे, छिन्न -भिन्न हारलता से वह व्याकुल थी, सखियाँ ओर दासियाँ उसके पीछे चल रही थी ओर वह भयविह्नल थी । चन्द्रमा के तुल्य सुन्दर उसका मुँह था, सम्पूर्ण अंग भरींड के समान गौर थे, उसका स्तनमण्डल श्वासोच्छरास से हिल रहा था, उसके दाँत सितारों से मिलते जूलते थे, वह मूर्तिमती बिजली के तुल्य थ

सर्ग सन्दर्भ

तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चोवालीसवाँ सर्ग अन्तःपुर की बरबादी को सुनकर राजरानी को भयभीत देखकर राजा का युद्ध के लिए घर से निकलने का और लीला के तत्त्व का वर्णन |