Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 44, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
ततस्तथैवानुभवाज्जीवत्वं विन्दति स्फुटम् ।
सत्यं भवत्वसत्यं वा खे विभातमिदं जगत् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
रामचन्द्रजी, चिरकाल के विचाराभ्यास से हुए दृढ़ अनुभव से जीवत्व को वैसा ही स्पष्टरूप
से जानता है । यह संसार सत्य हो अथवा असत्य हो, चिदाकाश में ही यह स्फुरित हो रहा
है, चिदाकाश के सिवा अन्य कोई भी वस्तु कहीं भी सत् नहीं है