Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 44–47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 44, verses 44–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 44,45
संस्कृत श्लोक
रञ्जयत्येव जीवाणुः स्वेच्छाभिरनुभूतिभिः ।
अनुभूयन्तु एवाशु काश्चित्पूर्वानुभूतितः ॥ ४४ ॥
अपूवानुभवाः काश्चित्समाश्चैवासमास्तथा ।
क्वचित्कदाचित्ता एव क्वचिदर्धसमा अपि ॥ ४५ ॥
कचन्त्यसत्याः सत्याभा जीवाकाशेऽनुभूतयः ।
तत्कुलास्तत्समाचारास्तज्जन्मानस्तदीहिताः ॥ ४६ ॥
त एव मन्त्रिणः पौराः प्रतिभाने भवन्ति च ।
ते चैवात्मन्यलं सत्या देशकालेहितैः समाः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
जीव की जो भोगेच्छा है, वही संसार की उत्पादिका है । इस अंश में सत्यत्व और मिथ्यात्व
की उपयोगिता नहीं है, विषय चाहे सत्य हों, वाहे असत्य हों उनकी अनुरंजना ही संसार की
उत्पत्ति और स्थिति की मूल कारण है, जीव पहले स्वेच्छा से उत्पन्न विषयों की अनुभूति से
अनुरंजित होता है, तदनन्तर पूवनुभूत सव विषयो का पुनः अनुभव करता है, ऐसा कहते है ।
जीवाणु स्वेच्छाभूत अनुभूतियों से इस जगत् को रंजित करता हे । कुछ अनुभूतियाँ पूर्व
अनुभूतियों से ही शीघ्र अनुभव में आती हैं, कुछ पूर्व मेँ अनुभव न होने पर भी समान प्रतीत
होती हैं और कुछ कहीं पर असम ही प्रतीत होती हैं। वे ही ये हैं, यों कभी कहीं पर अर्धसम भी
वे प्रतीत होती है