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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 45, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

जीवस्योदेति या शक्तिर्यस्य यस्य यथा यथा । भाति तत्फलदा नित्यं तस्य तस्य तथा तथा ॥ १४ ॥ मां समाराधयन्त्यास्तु जीवशक्तिस्तवोदिता । तदा भवद्यदीह स्यां मुक्तास्मीति चिरं तदा ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसीके अनुसार ही मैं फल देती हूँ, ऐसा कहती है । जिस जिस जीव की जो शक्ति जैसे जैसे उदित होती है.उस-उस को वैसा वैसा फल देनेवाली वह कमनुष्ठान की हेतुभूत कामना के विषयरूप से स्फुरित होती है मेरी आराधना कर रही तुम्हारी तब यदि “इस संसार में मेरी मुक्ति होती, तो क्या ही अच्छा होता" ऐसी चिरकाल तक जीवशक्ति उदित हुई