Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verses 9–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 45, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ तद्देशलीलायां फुल्लायां तद्वरोदयात् ।
पूर्वलीलाब्रवीद्देवीं संदेहलुलिताशया ॥ ९ ॥
पूर्वलीलोवाच ।
ये सत्यकामाः सन्त्येवंसंकल्पा ब्रह्मरूपिणः ।
त्वादृशाः सर्वमेवाशु तेषां सिद्ध्यत्यभीप्सितम् ॥ १० ॥
तत्तेनैव शरीरेण किमर्थं नाहमीश्वरि ।
लोकान्तरमिदं नीता तं गिरिग्रामकं वद ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, तदनन्तर उस वर
के लाभ से उस देश में रहनेवाली लीला के सन्तोष से प्रफुल्लित होने पर उसकी स्थूल शरीर
से पतिलोकप्राप्ति और मेरी स्थूलदेह का त्याग कर पतिलोकप्राप्ति हुई, यह अन्तर कैसे ?
इस सन्देह से जिसकी चित्तवृत्ति चंचल हो गई थी, एेसी पूर्वलीला ने देवी से कहा : हे देवी, जो
लोग आपके सदुश सत्यकामनावाले ओर सत्यसंकल्प ब्रह्मरूपी हैं, उनके सब अभीष्ट शीघ्र
ही सिद्ध होते हैं। हे ईश्वरी, आपने सत्यकामता के बल से उसी स्थूल शरीर से मुझे गिरिग्रामरूप
इस लोकान्तर में क्यों नहीं पर्हैवाया २