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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 46, Verses 11–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 46, verses 11–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 11-14

संस्कृत श्लोक

मत्तसैनिकनिर्मुक्तैर्व्याप्तं कलकलारवैः । किंकिणीजालनिर्ध्वानैर्हेतिसंघट्टघट्टितैः ॥ ११ ॥ धनुश्चटचटाशब्दैः शरसीत्कारगायनैः । परस्पराङ्गनिष्पिष्टकवचौघझणज्झणैः ॥ १२ ॥ ज्वलदग्निटणत्कारैरार्तिमत्क्रन्दनारवैः । परस्परभटाह्वानैर्बन्दिविक्षुब्धरोदनैः ॥ १३ ॥ शिलाघनीकृताशेषब्रह्माण्डकुहरो ध्वनिः । हस्तग्राह्योऽभवद्भीमो दशाशाकुञ्जपूरकः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त ध्वनि मदोन्मत्तसैनिको द्वारा किये गये कोलाहल से, हथियारों को टकराने से प्रचुरमात्रा में हो रही रथ आदि में लगी हुई छोटी-छोटी घंटियों की ध्वनियों से, धनुषों की टंकारसे, बाणों की सरसराहट से, परस्पर के शरीरसे टकराये हुए कवचों की झनझनाहट से, जल रही अग्नि की कड़कड़ाहट से, दुःख भरी रोदन ध्वनि से, योद्धाओं में से एक दूसरे को पुकारने से और बन्दियों द्वारा वीरों का उत्साह बढ़ाने के लिए निन्दा करने से युद्ध के बिना ही हुए मानसिक घाव से कातर हुए लोगों के रोदन से व्याप्त थी । उसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्डरूपी बिल को पत्थर के समान ठोस बना दिया था यानी सारा ब्रह्माण्डमण्डल उक्त ध्वनि से भर गया था और उसने दसों दिशारूपी निकुंजों को पूर्ण कर दिया था, अतएव वह भीषण ध्वनि हाथ से पकड़ने के योग्य सी हुई