Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 46, Verses 2–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 46, verses 2–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 2-6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विदूरथः स्वसदनान्निर्गतः परिवारितः ।
परिवारेण महता ऋक्षौघेणेव चन्द्रमाः ॥ २ ॥
सन्नद्धसर्वावयवो लग्नहारविभूषणः ।
महाजयजयारावैः सुरेन्द्र इव निर्गतः ॥ ३ ॥
समादिशन्योधगणं शृण्वन्मण्डलसंस्थितिम् ।
आलोकयन्वीरगणानारुरोह नृपो रथम् ॥ ४ ॥
कूटाकारसमाकारं मुक्तामाणिक्यमण्डितम् ।
पताकापञ्चभिर्व्याप्तं द्युविमानमिवोत्तमम् ॥ ५ ॥
चक्रभित्तिपरिप्रोतप्रकचत्काञ्चनाङ्कुरम् ।
मुक्ताजालरणत्कारचारुविक्रमकूबरम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, राजा विदूरथ अपने महल से निकला
और जैसे चन्द्रमा तारामण्डल से परिवेष्टित होता है, वैसे ही वह सेनारूप परिवार से
परिवेष्टित हुआ, उसके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग कवच ओर अस्त्र-शस्तरों से सुसन्नद्ध थे,
हारआदि आभूषण अपने-अपने स्थानों मेँ शोभा पा रहे थे, वह जयकार की तुमुल ध्वनि के
साथ महेन्द्र के समान घर से निकला । योद्धाओं को तत् तत् कार्य का आदेश देता हुआ,
मन्त्रियों के मुँह से व्यूहरचना की स्थिति या देश की रक्षा-व्यवस्था को सुनता हुआ और
वीरगणों का निरीक्षण करता हुआ रथ पर चढ़ा । सुमेरु पर्वत के शिखर के आकार के समान
उस रथ का आकार था । मोती और मणियों से वह विभूषित था और पाँच पताकाएँ उसमें
फहरा रही थी, अतएव तह उत्तम स्वर्गलोक के विमान के सदुश था, उसमें पहिये और अगल
बगल की भीत में जड़ी हुई सोने की कीलें चमक रही थी, मोतियों की झनकार से उसका
विशाल अग्रभाग बड़ा सुन्दर प्रतीत हो रहा था