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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 47, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

लीलाद्वयमुवाच । देवि कस्मादकस्मान्नौ भर्ता जयति नौ रणे । वद त्वय्यपि तुष्टायामस्मिन्विद्रुतवारणे ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

हे देवि, आपके सन्तुष्ट होने पर भी हमारे पति इस रणभूमि में, जिसमें से हाथी भाग रहे हैं, अकस्मात्‌ विजय क्‍यों नहीं प्राप्त करते, कृपा कर कहिये