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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 47, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 3 ,4

संस्कृत श्लोक

श्रीसरस्वत्युवाच । चिरमाराधितानेन विदूरथनृपारिणा । अहं पुत्रि जयार्थेन न विदूरथभूभृता ॥ ३ ॥ तेनासावेव जयति जीयते च विदूरथः । ज्ञप्तिरन्तर्गता संविदेतां मां यो यदा यथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीसरस्वतीजी ने कहा : पुत्रियों, राजा विदूरथ के शत्रु इस राजा सिन्धु ने विजय के लिए चिरकाल तक मेरी आराधना की थी, राजा विदूरथ ने विजय की कामना से मेरी आराधना नहीं की थी, इसलिए यही (राजा सिन्धु ही) विजय प्राप्त करेगा और राजा विदूरथ पराजित होगा। सम्पूर्ण प्राणियों के हृदयान्तर्गत संवित्‌ ही मैं (ज्ञप्ति) हूँ उस ज्ञप्तिरूप मुझे जो पुरुष जब जैसा प्रेरित करता है, यानी काम, कर्म और वासना के बल से बल देने में प्रवृत्त करता है, तब उसका वैसा फल सम्पादन करती हूँ यानी तत्‌-तत्‌ फलरूप से विवर्तित होती हूँ