Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 48, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
जय देवि जयत्येष नाथोऽस्माकं विलोकय ।
किंचानेन शरौघेण मेरुरप्येति चूर्णताम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे देवि, आपकी जय हो, ये हमारे स्वामी
विजय प्राप्त कर रहे हैं, आप देखिये, इस बाणवृष्टि से, औरों की तो बात ही क्या है, मेरु भी
चूर-चूर हो सकता है