Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 48, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
बाणमन्दाकिनीपूरं व्रजन्तं सिन्धुपूरणे ।
वातायनात्तमालोक्य लीला तत्पुरवासिनी ॥ १४ ॥
तेन बाणसमूहेन जयमाशङ्क्य भर्तरि ।
उवाच वाक्यमानन्दविकसन्मुखपङ्कजा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस नगर में रहनेवाली लीला ने राजा सिन्धु को
(सागरको) भरने के लिए जा रहे बाणों की गंगा के उस प्रवाह को अरोखे से देखकर ओर उस
बाणसंघीत से अपने पति में विजय की आशा कर मारे आनन्द से विकसित मुखारविन्दवाली
होकर देवी से निम्नलिखित वाक्य कहा