Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 32–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 48, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
विदूरथोऽथ सौपर्णमाददेऽस्त्रं महास्त्रवित् ।
उदगुर्गरुडास्त्रेण सौपर्णाः पर्वता इव ॥ ३२ ॥
काञ्चनीकृतसर्वाशाः सर्वाशापरिपूरकाः ।
पक्षपर्वतसंरम्भजनितप्रलयानिलाः ॥ ३३ ॥
घोणानिलजवाकृष्टश्वसद्भुजगमण्डलाः ।
महाघुरघुरारावपूरिताम्भोधिखण्डकाः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर महास्त्रवेत्ता राजा विदूरथ ने सौपर्ण (गारुड)
अस्त्र को उठाया । गरुडास्त्र से पर्वतोंकी नाई विशालकाय गरुड उदित हुए उन्होंने सम्पूर्ण
दिशाओं को सुपर्णमय (सर्पमय) बना दिया, सब दिशाएँ उनसे छा गई ओर परो द्वारा परवाले
पर्वतो के तुल्य अपने उड़ने के वेग से उन्होने प्रलयकाल का वायु उत्सन्न कर दिया । अपने
श्वासके वेग से फुफकार मार रहे साँपों को खींच लिया तथा महान् घुर, घुर शब्द से समुद्र के
कुछ हिस्सों को भर दिया था