Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 35–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 48, verses 35–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
स सुपर्णघनोऽपात्तं सर्पौघं भूप्रपूरकम् ।
कष्टं शलशलायन्तमगस्त्य इव वारिधिम् ॥ ३५ ॥
सर्पकम्बलनिर्मुक्तं भूमण्डलमराजत ।
चिरात्तमवनीरन्ध्रमिव निर्वारिराशि च ॥ ३६ ॥
ततस्तद्गरुडानीकं क्वाप्यगच्छददृश्यताम् ।
दीपौघ इव वातेन शरदेवाब्दमण्डलम् ॥ ३७ ॥
वज्रभीत्येव पक्षौघपर्वतप्रकरः पुरः ।
स्वप्नदृष्टं जगदिव संकल्पपुरपूरवत् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे महामुनि श्री अगस्त्यजी ने भूमि को भरनेवाले
(प्लावित कर देनेवाले) कणष्टके साथ इधर उधर सरक रहे चंचल प्रवाहवाले समुद्र को पी
डाला था, वैसे ही उस गरूडास्त्र ने भूमि को आच्छन्न करनेवाले इधर उधर कष्ट के साथ
सरक रहे सर्परूपी प्रवाह को पी डाला