Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 41–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 48, verses 41–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
अन्धकारप्रवृत्तेन मषीपङ्कार्णवोपमम् ।
कज्जलाचलसंभारोद्भूतकल्पानिलैरिव ॥ ४१ ॥
अन्धकूपे निपतिता इवासन्सकलाः प्रजाः ।
कल्पान्त इव संशेमुर्व्यवहारा दिशं प्रतिं ॥ ४२ ॥
विदूरथोऽथ मार्तण्डं दीपं ब्रह्माण्डमण्डपे ।
अस्त्रं मन्त्रविदां श्रेष्ठः सृष्ट्वा मन्त्रो व्यचेष्टयत् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्धकार
के प्रसार से जगत् स्याही के पंक के सागर के तुल्य हो गया ओर अंजनपर्वत के उपादानरूप
धूलिकणों के साथ उत्पन्न हुए प्रलयवायुओं से व्याप्त सा हो गया । सब लोग मानों अन्धे कुएँ
में गिर गये थे, चारों दिशाओं के, कल्पान्तकाल की नाई, सब व्यवहार नेस्तनाबूद हो गये
थे