Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 48, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
अथोदिततमोम्भोधिमर्कागस्त्यो गभस्तिभिः ।
अपिबत्कृष्णमम्भोदं शरत्काल इवामलः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त मंत्रो मे श्रेष्ठ राजा विदूरथ ने ब्रह्माण्डमण्डल में दीपकतुल्य प्रकाश
करनेवाले सूयस्त्रि की सृष्टि कर गुप्तमन्त्रणा की कोई अपेक्षा किये विना ही जगत् को सचेष्ट
कर दिया ॥४ ३॥ तदनन्तर सूर्यरूपी अगस्त्य ने अपने किरणों से अन्धकार के सागर को, ऐसे
पी डाला जैसे निर्मल शरद् ऋतु काले मेघो को पी डालती हे