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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 66–67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 48, verses 66–67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 66,67

संस्कृत श्लोक

तामग्निसंततिं मत्तामाचचामाम्बुसंततिः । भुवनव्यापिनी संध्यामाशु कृष्णेव यामिनी ॥ ६६ ॥ तामग्निसंततिं पीत्वा पूरयामास भूतलम् । जलश्रीर्जटितं देहं निद्रेव व्यक्तिमेयुषी ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे भुवनव्यापिनी काली रात सन्ध्या को शीघ्र ही पी डालती है, वैसे ही जल संघात ने उन्मत्त उस अग्निसंघात को पी डाला | जलराशि ने महान्‌ विस्तार को प्राप्त उस अग्नि को पीकर जैसे व्यक्त (प्रकट) होती हुई निद्रा श्रम से श्रान्त शरीर को भर देती है, वैसे ही पहले ज्वालाओं से व्याप्त भुवनतल को भर दिया