Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 49, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
कूश्माण्डकोत्ताण्डवदण्डपादक्षुब्धासृगुत्क्षिप्ततरङ्गसिक्तैः ।
संध्याभ्ररागोत्करकोटिकान्ति भूतैरसृक्स्रोतसि दत्तसेतु ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
कूष्माण्डों के
उद्धतनृत्य में दण्डपाद से (पैरों को इधर उधर नचाने के एक प्रकार से) विक्षुब्ध रुधिर की उठी
हुई तरंगों से सींचे गये प्राणियों से उक्त सेना ने रुधिर के प्रवाह पर पुल बोध रक्खा था, उक्त
पुलकी कान्ति संध्याकाल के मेघ की प्रचुर लालिमा से भी करोड़ गुना अधिक था