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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verses 37–40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 49, verses 37–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 37-40

संस्कृत श्लोक

अथेतरोऽपि भूपालो मायां संचार्य तां गुरौ । राक्षसास्त्रं ससर्जाथ त्रैलोक्यग्रहणोन्मुखम् ॥ ३७ ॥ उदगुः पर्वताकाराः सर्वतः स्थूलराक्षसाः । देहमाश्रित्य निष्क्रान्ताः पातालान्नरका इव ॥ ३८ ॥ अथोदभूद्बलं भीमं ससुरासुरभीतिदम् । गर्जद्रक्षोमहानादवाद्यनृत्यत्कबन्धकम् ॥ ३९ ॥ मेदोमांसोपदंशाढ्यं रुधिरासवसुन्दरम् । क्षीबकूश्माण्डवेतालयक्षताण्डवसुन्दरम् ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर पिशाच, वेताल, रूपिका ओर भीषण कबन्धों से परिपूर्ण वह भीषण सेना पृथिवी को निगलने में समर्थ हुई ॥३ ६॥ तदुपरान्त राजा विदूरथ ने भी पहले प्रयोग करने के कारण शिक्षक तुल्य राजा सिन्धु पर उस माया को लौटाकर राक्षसास्त्र की सृष्टि की, उक्त राक्षसास्त्र तीनों लोकों को ग्रसने में तत्पर हुआ। चारों ओर से पर्वताकार महाकाय राक्षसों का आविर्भाव हुआ, मालुम होते थे कि मानों नरक ही देहधारण कर पाताल से निकले हों । तत्पश्चात्‌ देवता ओर असुरों को भयभीत करने वाली बड़ी भीषण राक्षससेना, जिसमें गरज रहे राक्षसों के महान्‌ सिंहनादरूपी बाजे से कबन्ध नाच रहे थे, उत्पन्न हुईं | वह सेना मेदा और मांसरूप उपदंश से (मद्य के ऊपर रुचनेवाली वस्तु यानी चाट से) भरी थी, रुधिररूपी मद्य से रंगी थी ओर मत्त कूष्माण्ड, वेताल ओर यक्षो के ताण्डव से (नृत्य से) बड़ी भली लगती थी