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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 5, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

शुद्धसंविन्मयत्वाद्यः खं भवेद्व्योमचिन्तया । पदार्थचिन्तयार्थत्वमिव तिष्ठत्यधिष्ठितः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

उससे अतिरिक्त व्योमादिशब्दवाच्य कोई दूसरी वस्तु नहीं है, ऐसा कहते हैं। शुद्ध ज्ञानमय होने के कारण जो आकाश के चिन्तन से (मैं आकाश हूँ इस प्रकार विचार करने से) आकाशभाव को और पदार्थो के चिन्तन से पदार्थत्व को धारण कर स्थित है