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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 5, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

कुर्वन्नपीह जगतां महतामनन्तवृन्दं न किंचन करोति न काश्चनापि । स्वात्मन्यनस्तमयसंविदि निर्विकारे त्यक्तोदयस्थितिमति स्थित एक एव ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अब आरोपित के मिथ्यात्व में कारण कहते हैं। चूँकि यह निविर्कार अतएव उत्पत्ति, स्थिति आदि से शून्य ज्ञानमय अपने स्वरूप में स्थित और अद्वितीय ही है अतएव अनेक महान्‌ ब्रह्माण्ड के समूहों को और विचित्र विविध लीलाओं को करता हुआ भी न कुछ कार्य करता है और लीला आदि चेष्टाएँ ही करता हे । भाव यह कि जिस कार्य का उपादान निर्विकार होता है वह मिथ्या होता है, यों कार्य के मिथ्यात्वमें निर्विकारोपादनकत्व ही हेतु है