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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 50, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 18, 19

संस्कृत श्लोक

अन्योन्यशस्त्रसंघट्टाद्भ्रमज्जालोल्लसत्तडित् । शब्दस्फुटद्विरिञ्चाण्डं धातमग्नकुलाचलम् ॥ १८ ॥ धारानिकृत्तशस्त्रौघमस्त्रयोर्युध्यमानयोः । मदस्त्रवारणेनैव कालोपायोऽचलात्मनः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर परस्पर के शस्त्रास्त्रों के टकराने से घूम रहे जाल की नाईं बिजलियाँ प्रदीप्त होती थी, कलकल शब्द से ब्रह्माण्ड मानों फूटा जा रहा था, प्रहार से बड़े-बड़े कुलपर्वत छिन्न-भिन्न हो गये थे, परस्पर जूझ रहे अस्त्रो की शरवृष्टि ने शस्त्रास्त्रं के ढेर को काट कर गिरा दिया था पर्वत की नाई निश्चल राजा विदूरथ मेरे द्वारा विश्वामित्र के अस्त्रों के निवारण की नाई केवल अस्त्रनिवारणमात्रसे स्थित थे,उनकी ऐसी स्थिति केवल कालक्षेप का उपाय था