Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 20–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 50, verses 20–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 20-26
संस्कृत श्लोक
अयं कियद्बल इति सिन्धौ तिष्ठति हेलया ।
विदूरथोऽस्त्रमाग्नेयं तत्याजाशनिशब्दवत् ॥ २० ॥
ज्वालयामास स रथं सिन्धोः कक्षमिवारसम् ।
एतस्मिन्नन्तरे व्योम्नि हेतिनिर्विवरोदरे ॥ २१ ॥
ससन्नाह इव प्रावृट्पयोदतटिनीव यः ।
अस्त्रे राज्ञोः क्षणं कृत्वा युद्धं परमदारुणम् ॥ २२ ॥
अन्योन्यं शममायाते सवीर्ये सुभटाविव ।
एतस्मिन्नन्तरे सोऽग्नी रथं कृत्वा तु भस्मसात् ॥ २३ ॥
प्राप दग्ध्वा वनं सिन्धुं मृगेन्द्रमिव कन्दरात् ।
सिन्धुरभ्यासतोऽग्न्यस्त्रं वारुणास्त्रेण शामयन् ॥ २४ ॥
रथं त्यक्त्वावनिं प्राप्य खड्गास्फोटकवानभूत् ।
अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण रथाश्वानां रिपोः खुरान् ॥ २५ ॥
लुलाव करवालेन मृणालानीव लाघवात् ।
विदूरथोऽपि विरथो बभूवास्फोटकासिमान् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे सामने इसकी क्या हस्ती हे, यों
राजा विदूरथ की अवहेलना से राजा सिन्धु के स्थित होने पर राजा विदूरथने सिंधु के ऊपर
वज़-निर्घोषयुक्त अग्नेय अस्त्र छोड़ा उक्त आग्नेय अस्त्र ने सूखी हुई घास के ढेर की नाई
राजा सिन्धु के रथ को जला दिया । इसी बीच में जब कि अस्त्र-शस्त्रो से आकाश ऐसा पट
गया था कि कहीं पर भी सुराख दृष्टिगोचर नहीं होता था, जो राजा सन्नद्ध था वह तो वर्षा
ऋतु की नाई बाणो की वर्षा करता था और जो दूसरा राजा था वह मेघ से बढ़ाई गई नदी
की नाई बहता था । दोनों राजाओं के पहले प्रयुक्त दो बलवान् वैष्णवास्त्र क्षणभर के लिए
परस्पर भीषणतम युद्ध कर दो बलवान् योद्धाओं की नाई शान्त हो गये । इसी बीच मेँ जैसे
वनाग्नि वन को जलाकर गुहा से निकले हुए सिंह को प्राप्त होती है, वैसे ही आग्नेयास्त्र की
अग्नि राजा सिन्धु के रथ को जलाकर सिन्धु को प्राप्त हुई । राजा सिन्धु ने हस्तलाधव से
आग्नेयार्त्र को वारुणारत्र से शान्त कर दिया और अपने जले हुए रथ को छोडकर पृथिवी
पर आकर ढाल ओर तलवार से लैस हो गये । राजा सिन्धु ने नेत्रो के पलक गिरने भर में शत्रु
के रथ के घोडे के खुरो को कमलनाल की नाई बड़ी फुर्ती से काट दिया । अब तो राजा
विदूरथ भी रथ रहित हो गये, अतएव उन्होने भी हाथ मेँ ढाल-तलवार ली