Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 27–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 50, verses 27–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 27-36
संस्कृत श्लोक
समायुधौ समोत्साहौ चेरतुर्मण्डलानि तौ ।
खड्गौ क्रकचतां यातौ मिथः प्रहरतोस्तयोः ॥ २७ ॥
दन्तमालेयमस्येव बले चर्वयतः प्रजाः ।
शक्तिमादाय चिक्षेप खङ्गं त्यक्त्वा विदूरथः ॥ २८ ॥
सिन्ध्वम्बुघर्घरारावो महोत्पात इवाशनिः ।
अविच्छिन्ना समायाता पतिता सास्य वक्षसि ॥ २९ ॥
अप्रियस्य यथा भर्तुरनिच्छन्ती स्वकामिनी ।
तेन शक्तिप्रहारेण नासौ मरणमाप्तवान् ॥ ३० ॥
केवलं रुधिरव्रातं नागो जलमिवात्यजत् ।
तद्देशलीला तं दृष्ट्वा भग्नं तम इवेन्दुना ॥ ३१ ॥
सविकासघनानन्दा पूर्वलीलामुवाच ह ।
देवि पश्य नृसिंहेन हतो भर्त्रायमावयोः ॥ ३२ ॥
शक्तिकोटिनखैर्दैत्यः सिन्धुरुद्घुरकन्धरः ।
सरःस्थलस्थनागेन्द्रकरफूत्कृतवारिवत् ॥ ३३ ॥
पिष्टो रसोऽस्य निर्याति रक्तं चुलचुलारवैः ।
हा कष्टं रथमानीतं सिन्धुरारोढुमुद्यतः ॥ ३४ ॥
सौवर्णं मैरवं शृङ्गं पुष्करावर्तको यथा ।
पश्य देवि रथोऽस्यासौ मुद्गरेण विचूर्णितः ॥ ३५ ॥
भ्रमत्पार्थनिपातेन सौवर्णं नगरं यथा ।
प्रवृत्तो रथमारोढुमानीतं पतिरेष मे ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तलवार का त्याग कर शक्ति ली ओर उसे शत्रु के ऊपर छोड़ा । वह शक्ति मथे जा रहे
समुद्र के जल की नाई गम्भीर घर-घर शब्द से युक्त प्रलय आदि बड़े-बड़े उत्पातो को सूचित
करने वाली वजपात के समान आई और राजासिन्धु की छाती पर गिरी, वह ऐसी गिरी जैसे
कि अप्रिय पति के वक्षस्थल पर उसे न चाहनेवाली भार्या गिरती है, उस शक्ति के प्रहार से
राजा सिन्धु के प्राण गये नहीं, किन्तु केवल उसकी छाती से हाथी की सूंड से जलधारा की
नाई खून की धारा बही चन्द्रमा से नष्ट किये गये अन्धकार की नाई उसे (सिन्धु को) राजा
विदूरथ से भग्न किया हुआ देखकर उस देशकी लीला बड़ी प्रसन्न हुई उसके आनन्द का
पार न रहा । उसने पूर्वलीला से कहा: हे देवी, देखो, नृसिंह रूप हमारे पति ने
हिरण्यकशिपुरूपी महाबलवान् इस सिन्धु को शक्ति के शिखरमयी नखों से मार दिया हे ।
जैसे तालाब के बीच में खड़े हुए हाथी की सड से फुफकारपूर्वक जलधारा गिरती है, वैसे ही
इसके चूर्ण-विचूर्ण वक्षस्थलसे "चुल-चुल“ शब्द के साथ खून निकल रहा हे । हा बड़े दुःख
की बात है कि लाये गये रथ पर चढ़ने के लिए वह ऐसा तैयार हो गया है, जैसे कि सोने के
मेरुशिखर पर पुष्करावर्त मेघ चढ़ता है । हे देवि देखो, इसका यह रथ मुद्गर से चूर चूर कर
दिया गया है । हे देवि, ये हमारे स्वामी लाये गये रथ में बैठने के लिए उद्यत हैं । अर्जुन की
बाणवर्षा से निवातकवचनामक दानवो की सुवर्ण निर्मित नगरी की नाई घूम रहे उस रथ को
आप देखिये