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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 37–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 50, verses 37–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 37-39

संस्कृत श्लोक

कष्टं वज्रमिवेन्द्रेण मुसलं सिन्धुनेक्षितम् । जवात्पतिः प्रयातो मे सैन्धवं मुसलायुधम् ॥ ३७ ॥ वञ्चयित्वा विलासेन रथमारुह्य लाघवात् । हा धिक्कष्टमसौ सिन्धुरार्यपुत्ररथं रयात् ॥ ३८ ॥ हरिश्वभ्रमिवारूढं प्लवेनोर्ध्वमिव द्रुमम् । क्रीडित्वा पीडयामास शरवर्षैर्विदूरथम् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

हा बड़े खेद की बात है कि जैसे इन्द्र अपने शत्रु पर प्रहार करने के लिए वज्र को देखते हैं यानी ग्रहण करते है, वेसे ही सिन्धु ने हमारे स्वामी पर प्रहार करने के लिए मूसल को देखा यानी ग्रहण किया । हमारे स्वामी मूसलरूप हथियार वाले राजा सिन्धु को चकमा देकर बड़ी फुर्ती से रथ पर सवार होकर वेग से हट गये हैं । हाय बड़ा कष्ट उपस्थित हुआ । इस राजा सिन्धु ने बड़े वेग से हमारे स्वामी के रथ को, जो कि सेवाल आदि से हरे रंग के तालाब की नाई हरा है और वृक्ष की नाई ऊँचा है ओर पताका से चिह्नित होने के कारण प्लव से (एक प्रकार के पक्षी से) युक्त है, पीडित कर यानी बाणवृष्टि से छिन्न- भिन्न कर बाणों की वृष्टियों से हमारे पति विदूरथ को व्यथित कर दिया